देहरादून

मुफ्त डिनर का झांसा देकर लूटा, अब उपभोक्ता आयोग ने कंपनी पर लगाया भारी जुर्माना

मुख्य संपादक · 21 जनवरी 2026 | 02:36 pm

Upbhogta (1)
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देहरादून: राजधानी देहरादून में मुफ्त डिनर का झांसा देकर लोगों को महंगे और फर्जी हॉलिडे पैकेज बेचने वाली एक कंपनी पर जिला उपभोक्ता आयोग ने कड़ा चाबुक चलाया है। आयोग ने धोखाधड़ी का शिकार हुए एक पीड़ित ग्राहक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कंपनी को न केवल पूरी रकम ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया, बल्कि मानसिक प्रताड़ना और कानूनी खर्च के रूप में भारी जुर्माना भी लगाया है। यह मामला उन तमाम लोगों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो लुभावने विज्ञापनों और ‘फ्री’ के चक्कर में अपनी मेहनत की कमाई गंवा बैठते हैं।


पूरा घटनाक्रम: फ्री डिनर से लेकर 1.40 लाख की चपत तक

मामला जनवरी 2022 का है, जब देहरादून निवासी जितेंद्र कुमार को एक कंपनी ने शहर के एक प्रतिष्ठित होटल में मुफ्त डिनर के लिए आमंत्रित किया। वहां मौजूद कंपनी के सेल्स प्रतिनिधियों ने बातों का ऐसा जाल बुना कि जितेंद्र उनकी 10 साल की ‘हॉलिडे मेंबरशिप स्कीम’ के झांसे में आ गए। सेल्स टीम ने उन्हें मौखिक रूप से कई बड़े वादे किए, जिनमें पीक सीजन में बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के होटल बुकिंग और खाने-पीने के बिल पर 30 फीसदी की भारी छूट का लालच दिया गया था।

भरोसे में आकर जितेंद्र कुमार ने अपने क्रेडिट कार्ड के जरिए 1.40 लाख रुपये का भुगतान कर दिया। भुगतान होते ही कंपनी ने अपनी असली रणनीति दिखाई और उनसे एक छपे हुए एग्रीमेंट पर आनन-फानन में हस्ताक्षर करवा लिए। पीड़ित को एग्रीमेंट पढ़ने तक का समय नहीं दिया गया।

सच्चाई आई सामने: मौखिक वादे निकले खोखले

जब जितेंद्र ने घर जाकर एग्रीमेंट को विस्तार से पढ़ा, तो उनके होश उड़ गए। जो वादे मौखिक तौर पर किए गए थे, वे लिखित शर्तों में कहीं नहीं थे। इसके उलट, एग्रीमेंट में हर साल 9,500 रुपये का अनिवार्य मेंटेनेंस चार्ज जोड़ दिया गया था और खाने पर छूट जैसी कोई बात ही नहीं थी। ठगी का अहसास होने पर उन्होंने उसी रात कंपनी से पैसे वापस मांगे, लेकिन कंपनी ने अपनी ‘नो-रिफंड पॉलिसी’ (पैसा वापस न करने की शर्त) का हवाला देकर साफ इनकार कर दिया।

उपभोक्ता आयोग की फटकार और सख्त फैसला

थक-हारकर पीड़ित ने जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। आयोग के अध्यक्ष पुष्पेन्द्र खरे और सदस्य अल्का नेगी की पीठ ने मामले की गहन सुनवाई की। आयोग ने पाया कि कंपनी ने भ्रामक जानकारी देकर और तथ्यों को छुपाकर ग्राहक से हस्ताक्षर कराए थे।

आयोग ने अपने फैसले में निम्नलिखित आदेश दिए:

  • रकम की वापसी: कंपनी को 45 दिनों के भीतर ग्राहक के 1.40 लाख रुपये वापस करने होंगे।

  • ब्याज: इस राशि पर नवंबर 2023 (मुकदमा दाखिल करने की तिथि) से भुगतान तक 6 फीसदी वार्षिक ब्याज भी देना होगा।

  • मुआवजा: मानसिक प्रताड़ना के लिए 20 हजार रुपये का जुर्माना।

  • कानूनी खर्च: मुकदमा लड़ने के खर्च के रूप में 5 हजार रुपये का भुगतान।

आम आदमी को क्या फायदा और आगे क्या बदलेगा?

यह फैसला उन कंपनियों के लिए एक कड़ा संदेश है जो ‘नो-रिफंड पॉलिसी’ जैसी अवैध शर्तों के पीछे छिपकर ग्राहकों का शोषण करती हैं। आयोग ने स्पष्ट कर दिया कि ऐसी कोई भी शर्त जो ग्राहक के हितों के खिलाफ हो और भ्रामक तरीके से थोपी गई हो, कानूनन वैध नहीं है। इस फैसले से आम उपभोक्ताओं का कानूनी व्यवस्था पर भरोसा बढ़ेगा और कंपनियों की मनमानी पर लगाम लगेगी।

निष्कर्ष: सतर्कता ही बचाव है

उपभोक्ता आयोग का यह निर्णय जनहित में एक मिसाल है। यह साबित करता है कि यदि ग्राहक जागरूक हो और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाए, तो बड़ी से बड़ी कंपनी को भी झुकना पड़ता है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे किसी भी समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले दस्तावेजों को पूरी तरह पढ़ना और ‘मुफ्त’ के प्रस्तावों की असलियत को समझना सबसे जरूरी है।

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