अल्मोड़ा

दीवान सिंह कनवाल('दीवान दा') के संघर्ष, सफलता और उनकी सांस्कृतिक विरासत को समेटती 20 अनसुनी कहानियाँ, नए शीर्षकों के साथ यहाँ दी गई हैं:

मुख्य संपादक · 11 मार्च 2026 | 11:44 am

Dewanda
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अल्मोड़ा-संघर्ष और शुरुआती सफर

  1. दिल्ली की सड़कों पर ‘रसना’ बेचना: संघर्ष के दिनों में मोहन उप्रेती जी से नाटक सीखने के दौरान अपना खर्चा चलाने के लिए उन्होंने दिल्ली में कोल्ड ड्रिंक बेचा।

  2. मंदोदरी का पहला मंचन: हुक्का क्लब की रामलीला में उनके अभिनय की शुरुआत एक महिला पात्र ‘मंदोदरी’ के रूप में हुई थी।

  3. ‘मेघा आ’ का पहला ब्रेक: जीवन बिष्ट जी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और कुमाऊंनी सिनेमा की पहली बड़ी फिल्म में उन्हें गाने का मौका दिया।

  4. बैंकर और कलाकार का संतुलन: दिन भर बैंक मैनेजर की गंभीर जिम्मेदारी और शाम को हुड़के की थाप पर लोक कलाकार का अनूठा संगम।

रंगमंच और अभिनय की दुनिया

  1. हुक्का क्लब के ‘दशरथ’: दशकों तक अल्मोड़ा की रामलीला में राजा दशरथ के किरदार को अपनी आवाज़ और अभिनय से जीवंत किया।

  2. मोहन उप्रेती के शागिर्द: दिल्ली के ‘पृथ्वी लोक कला केंद्र’ में रहकर लोक नाटकों की बारीकियां सीखीं, जो उनके निर्देशन में साफ झलकती थीं।

  3. 5 हिंदी फिल्मों में दस्तक: क्षेत्रीय कलाकार होने के बावजूद उन्होंने 5 हिंदी फिल्मों में काम कर अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया।

  4. लोक गाथाओं के रक्षक: ‘अजुआ बफौल’ और ‘कल बिष्ट’ जैसे ऐतिहासिक नाटकों को मंच पर पुनर्जीवित करने का श्रेय उन्हें जाता है।

संगीत और कला की साधना

  1. हुड़की के ‘B-High’ ग्रेड मास्टर: वे केवल गायक नहीं थे, बल्कि पारंपरिक वाद्य यंत्र हुड़की बजाने में भी आकाशवाणी से उच्च श्रेणी प्राप्त थे।

  2. स्वयं की धुनें (Self-Composer): उन्होंने अपने गाए अधिकतर गीतों का संगीत और धुन खुद तैयार की थी।

  3. आकाशवाणी के 35 साल: नजीबाबाद और अल्मोड़ा केंद्रों से वे दशकों तक उत्तराखंड की आवाज़ बने रहे।

  4. शेरदा ‘अनपढ़’ की कलम और दीवान की आवाज़: जन कवि शेरदा के व्यंग्यात्मक गीतों को दीवान दा ने अपनी आवाज़ से घर-घर पहुँचाया।

संस्कृति के प्रति समर्पण

  1. हिमालय लोक कला केंद्र की स्थापना: नए कलाकारों को तराशने के लिए उन्होंने खुद की संस्था बनाई ताकि लोक कला कभी लुप्त न हो।

  2. बिना व्यापार की कला साधना: रिटायरमेंट के बाद भी उन्होंने संगीत को कभी पैसा कमाने का जरिया नहीं बनाया, बल्कि इसे सेवा माना।

  3. पांडिचेरी से बॉम्बे तक कुमाऊंनी गूँज: देश के अलग-अलग कोनों में जाकर उन्होंने पहाड़ी लोक गीतों के कार्यक्रम किए।

  4. शुद्ध लोक संगीत के पैरोकार: वे आधुनिकता के पक्षधर थे, लेकिन लोक गीतों की मूल आत्मा और शब्दों से छेड़छाड़ के सख्त खिलाफ थे।

अंतिम पड़ाव और विरासत

  1. ‘द्वी दिनो का दयार’ की विदाई: जाने से कुछ समय पहले उनका यह गीत युवाओं के बीच भी जबरदस्त हिट हुआ, जो उनके जीवन का संदेश भी बन गया।

  2. खत्याड़ी गाँव का गौरव: इतने बड़े कलाकार होने के बावजूद वे अपने गाँव और जड़ों से हमेशा जुड़े रहे।

  3. नंदा चालीसा की गूँज: उनके द्वारा गाई गई नंदा चालीसा आज भी कुमाऊं के हर धार्मिक आयोजन का हिस्सा है।

  4. सांस्कृतिक पुल: वे पुराने दौर की लोक गायकी और आज के डिजिटल युग के बीच एक मज़बूत कड़ी बनकर रहे।

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