भारत का पहला सुपरस्टार: राजेश खन्ना की वह दीवानगी, जब एक झलक के लिए थम जाता था जमाना | पुण्यतिथि विशेष
मुख्य संपादक · 18 जुलाई 2026 | 08:48 am

संपादकीय। हिंदी सिनेमा में सितारे बहुत हुए, सुपरस्टार भी कई आए, लेकिन राजेश खन्ना की कहानी कुछ अलग है। वह उस दौर के नायक थे जब न सोशल मीडिया था, न इंटरनेट और न ही सितारों को रातोंरात लोकप्रिय बनाने वाले डिजिटल प्लेटफॉर्म। इसके बावजूद उनकी एक झलक पाने के लिए प्रशंसकों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। सिनेमाघरों के बाहर लंबी कतारें लगती थीं और पर्दे पर उनकी मुस्कान दर्शकों के दिलों पर ऐसा असर छोड़ती थी कि राजेश खन्ना केवल एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक दौर की पहचान बन गए।
18 जुलाई 2012 को राजेश खन्ना ने दुनिया को अलविदा कह दिया था। आज उनकी पुण्यतिथि पर जब भारतीय सिनेमा उन्हें याद कर रहा है, तब सवाल यह नहीं है कि उन्होंने कितनी सफल फिल्में दीं। असली सवाल यह है कि आखिर राजेश खन्ना में ऐसा क्या था जिसने उन्हें भारतीय सिनेमा का पहला ‘सुपरस्टार’ बना दिया?
‘आराधना’ और शुरू हुआ सुपरस्टारडम का दौर
राजेश खन्ना का फिल्मी सफर 1960 के दशक में शुरू हुआ, लेकिन वर्ष 1969 उनके करियर का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। फिल्म ‘आराधना’ की जबरदस्त सफलता ने उन्हें घर-घर में लोकप्रिय बना दिया। इसके बाद ‘दो रास्ते’, ‘कटी पतंग’, ‘सच्चा झूठा’, ‘आनंद’, ‘अमर प्रेम’, ‘हाथी मेरे साथी’, ‘दुश्मन’, ‘बावर्ची’ और ‘नमक हराम’ जैसी फिल्मों ने उनकी लोकप्रियता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
राजेश खन्ना की सफलता केवल बॉक्स ऑफिस तक सीमित नहीं थी। उनकी लोकप्रियता ने भारतीय सिनेमा में ‘स्टारडम’ की परिभाषा ही बदल दी। उनके हेयरस्टाइल, कपड़े पहनने का अंदाज, सिर को हल्का झुकाकर संवाद बोलने की शैली और उनकी मुस्कान तक की नकल होने लगी।
जब प्रशंसकों की दीवानगी बन गई इतिहास
राजेश खन्ना के स्टारडम से जुड़ी कहानियां आज भी हिंदी सिनेमा के इतिहास का हिस्सा हैं। उनके सार्वजनिक कार्यक्रमों में भारी भीड़ जुटती थी। अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने भी वर्षों बाद उनके स्टारडम को याद करते हुए बताया था कि महिलाएं उनकी एक झलक पाने के लिए स्टूडियो के बाहर कतारों में खड़ी रहती थीं और सार्वजनिक स्थानों पर उन्हें पुलिस सुरक्षा की जरूरत पड़ती थी।
यह वह दौर था जब किसी अभिनेता की लोकप्रियता को सोशल मीडिया फॉलोअर्स से नहीं मापा जाता था। दर्शकों का प्यार सिनेमाघरों की भीड़, टिकट खिड़की पर लगी कतारों और प्रशंसकों की दीवानगी में दिखाई देता था। इस पैमाने पर राजेश खन्ना का स्टारडम अपने आप में एक सांस्कृतिक घटना बन गया।
अभिनय के साथ संगीत ने बनाया अमर
राजेश खन्ना की लोकप्रियता में हिंदी फिल्म संगीत का योगदान भी बेहद महत्वपूर्ण रहा। किशोर कुमार की आवाज और पर्दे पर राजेश खन्ना की अदाकारी का मेल भारतीय फिल्म इतिहास की सबसे यादगार जोड़ियों में गिना जाता है।
‘मेरे सपनों की रानी’, ‘रूप तेरा मस्ताना’, ‘ये शाम मस्तानी’, ‘प्यार दीवाना होता है’, ‘चिंगारी कोई भड़के’ और ‘जिंदगी के सफर में’ जैसे अनेक गीत आज भी नई पीढ़ी सुनती है। आरडी बर्मन के संगीत, किशोर कुमार की आवाज और राजेश खन्ना की स्क्रीन उपस्थिति ने मिलकर हिंदी सिनेमा को कई कालजयी गीत दिए।
यही कारण है कि राजेश खन्ना को याद करना केवल उनकी फिल्मों को याद करना नहीं है। उनके साथ हिंदी सिनेमा के उस स्वर्णिम संगीत युग की यादें भी जुड़ी हैं जिसने कई पीढ़ियों को प्रभावित किया।
‘आनंद’ ने दिखाई अभिनेता की गहराई
यदि राजेश खन्ना के स्टारडम को समझना हो तो उनकी लोकप्रिय फिल्मों को देखा जा सकता है, लेकिन उनके अभिनय की गहराई को समझने के लिए ‘आनंद’ का उल्लेख जरूरी है।
जिंदगी और मृत्यु के बीच खड़े एक ऐसे व्यक्ति का किरदार, जो अपनी तकलीफ के बावजूद दूसरों के जीवन में खुशियां बांटता है, राजेश खन्ना के करियर की सबसे यादगार भूमिकाओं में शामिल है। इस फिल्म में उनका ‘बाबू मोशाय’ कहने का अंदाज भारतीय सिनेमा की स्मृतियों में स्थायी रूप से दर्ज हो गया।
‘आनंद’ यह साबित करती है कि राजेश खन्ना की लोकप्रियता केवल उनके रोमांटिक अंदाज पर आधारित नहीं थी। उनमें गंभीर और संवेदनशील किरदारों को पर्दे पर जीवंत करने की क्षमता भी थी।
रिकॉर्ड से बड़ी थी उनकी लोकप्रियता
राजेश खन्ना के शुरुआती सुपरस्टार दौर में लगातार सफल फिल्मों की ऐसी श्रृंखला देखने को मिली, जिसने हिंदी फिल्म उद्योग में उनकी बादशाहत स्थापित कर दी। अलग-अलग स्रोत उनकी लगातार सफल फिल्मों की संख्या को अलग तरीके से वर्गीकृत करते हैं, लेकिन इस बात पर व्यापक सहमति है कि 1969 से शुरुआती 1970 के दशक के बीच उनका बॉक्स ऑफिस दबदबा असाधारण था।
उनके करियर में 100 से अधिक फिल्मों में एकल मुख्य नायक की भूमिका निभाने का उल्लेख भी मिलता है। तीन बार उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला और भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए उन्हें मरणोपरांत वर्ष 2013 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
सुपरस्टारडम हमेशा नहीं रहा, विरासत हमेशा रही
हर सितारे के जीवन में एक दौर ऐसा आता है जब समय बदलता है। 1970 के दशक के मध्य में हिंदी सिनेमा का स्वरूप भी बदलने लगा। रोमांटिक नायक की जगह व्यवस्था से नाराज ‘एंग्री यंग मैन’ का दौर आया और अमिताभ बच्चन तेजी से नई पीढ़ी के सबसे बड़े सितारे बनकर उभरे।
राजेश खन्ना का बॉक्स ऑफिस प्रभुत्व पहले जैसा नहीं रहा, लेकिन उनकी पहचान खत्म नहीं हुई। उन्होंने बदलते दौर में भी फिल्मों में काम जारी रखा और बाद में राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाई। वह नई दिल्ली लोकसभा सीट से सांसद भी रहे।
उनका सफर यह भी बताता है कि स्टारडम स्थायी नहीं होता, लेकिन एक कलाकार द्वारा छोड़ी गई सांस्कृतिक विरासत समय से कहीं बड़ी हो सकती है।
आखिर क्यों आज भी याद आते हैं ‘काका’?
राजेश खन्ना को उनके प्रशंसक प्यार से ‘काका’ कहते थे। आज उनके निधन के 14 वर्ष बाद भी उनकी फिल्मों और गीतों की लोकप्रियता यह बताती है कि सच्चा स्टारडम केवल बॉक्स ऑफिस आंकड़ों में नहीं मापा जा सकता।
आज के दौर में सितारों की लोकप्रियता सोशल मीडिया, ब्रांड वैल्यू और वैश्विक पहुंच से मापी जाती है। राजेश खन्ना का दौर अलग था। उनकी सबसे बड़ी ताकत दर्शकों के साथ बना भावनात्मक रिश्ता था।
उनकी मुस्कान में रोमांस था, उनकी आंखों में उदासी और संवाद अदायगी में एक ऐसी सहजता थी जो सीधे दर्शकों तक पहुंचती थी। शायद यही वजह है कि नई पीढ़ी का दर्शक भी जब ‘आनंद’ देखता है या ‘अमर प्रेम’ के गीत सुनता है तो राजेश खन्ना उसे बीते हुए दौर के कलाकार भर नहीं लगते।
संपादकीय दृष्टि: सितारा चला गया, सुपरस्टार की कहानी बाकी है
18 जुलाई केवल राजेश खन्ना की पुण्यतिथि नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा के उस दौर को याद करने का अवसर भी है जब एक अभिनेता की लोकप्रियता जनभावना में बदल गई थी।
राजेश खन्ना के बाद भारतीय सिनेमा ने अमिताभ बच्चन से लेकर शाहरुख खान, सलमान खान और आमिर खान तक कई बड़े सितारों का दौर देखा। हर पीढ़ी ने अपना सुपरस्टार चुना, लेकिन हिंदी सिनेमा में ‘सुपरस्टार’ शब्द की पहली व्यापक पहचान जिस अभिनेता के साथ जुड़ी, वह नाम राजेश खन्ना का था।
उनका जीवन सफलता की चमक और स्टारडम की अस्थिरता—दोनों की कहानी कहता है। शायद उनकी सबसे बड़ी विरासत यही है कि समय किसी सितारे की चमक को कम कर सकता है, लेकिन दर्शकों के दिल में बनी उसकी जगह को आसानी से नहीं मिटा सकता।
आज ‘काका’ हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी मुस्कान, उनका ‘बाबू मोशाय’, किशोर कुमार की आवाज में पर्दे पर उनका अंदाज और उनकी फिल्मों की यादें अब भी जीवित हैं।
राजेश खन्ना चले गए, लेकिन हिंदी सिनेमा का पहला सुपरस्टार आज भी पर्दे पर मुस्कुरा रहा है।
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