अल्मोड़ा

स्याल्दे बिखौती मेला: अल्मोड़ा की पाली पछाऊं घाटी में लोक संस्कृति का शंखनाद, चार दिनों तक बिखरेगी सांस्कृतिक छटा

मुख्य संपादक · 13 अप्रैल 2026 | 08:54 am

Almora uttarakhand
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द्वाराहाट (अल्मोड़ा)। कुमाऊं की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक पौराणिक ‘स्याल्दे बिखौती’ मेला आज यानी सोमवार, 13 अप्रैल से पूरे उत्साह और पारंपरिक उल्लास के साथ शुरू हो गया है। अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट स्थित ऐतिहासिक विभांडेश्वर मंदिर परिसर में आयोजित होने वाला यह चार दिवसीय मेला कुमाऊंनी लोक संस्कृति, आपसी प्रेम और एकता का अनूठा संगम है। मेले का औपचारिक शुभारंभ शाम 4 बजे रणबांकुरों द्वारा ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक निशानों के साथ मंदिर की परिक्रमा कर किया गया। इस दौरान समूची पाली पछाऊं घाटी लोक वाद्यों की गूँज से सराबोर रही।


परंपरा और इतिहास का संगम: विभांडेश्वर मंदिर में उमड़ा जनसैलाब

स्याल्दे बिखौती मेले का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व सदियों पुराना है। सोमवार को मेले के पहले दिन विभांडेश्वर मंदिर में भारी संख्या में ग्रामीण और श्रद्धालु एकत्र हुए। मेले की शुरुआत ‘बट पुजै’ रस्म के साथ हुई, जिसमें द्वाराहाट नगर में भव्य सांस्कृतिक जुलूस निकाला गया। शाम होते-होते नौज्यूला धड़े की ओर से ‘ओडा भेंटने’ की पारंपरिक रस्म अदा की गई, जो इस मेले की विशिष्ट पहचान है।

मेले के दौरान आल, गरख और नौज्यूला धड़ों से जुड़े विभिन्न गांवों के लोग अपने-अपने ढोल-नगाड़ों, रणसिंगों और दुंदुभियों के साथ मंदिर परिसर में पहुंचे। हुड़के और चिमटे की थाप पर झोड़ा-चांचरी और भगनौल गायन ने उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। परंपरा के अनुसार, विभिन्न दलों ने मंदिर परिसर में अपने निर्धारित स्थानों पर एकत्र होकर लोक विधाओं का प्रदर्शन किया।

चार दिनों का पूरा कार्यक्रम और रस्में

यह मेला चार दिनों तक अलग-अलग चरणों में मनाया जाता है, जिसमें हर दिन का अपना विशेष महत्व है:

  • 13 अप्रैल (पहला दिन): मेले का शुभारंभ और विभांडेश्वर मंदिर में रणबांकुरों का आगमन।

  • 14 अप्रैल (दूसरा दिन): सुबह श्रद्धालु सरस्वती, सुरभि और नंदिनी नदियों के पावन संगम पर स्नान करेंगे। इसके पश्चात मंदिर में पूजा-अर्चना कर अपने गांवों को प्रस्थान करेंगे।

  • 15 अप्रैल (तीसरा दिन): इसे मुख्य ‘स्याल्दे मेला’ कहा जाता है। इस दिन गरख और आल धड़ों की ओर से ओडा भेंटने की रस्म निभाई जाएगी और देर शाम तक सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम रहेगी।

  • 16 अप्रैल (चौथा दिन): मेले का समापन व्यापारिक मेले और मीना बाजार के रूप में होगा, जहाँ क्षेत्रीय उत्पादों की प्रदर्शनी और बिक्री की जाएगी।

लोद घाटी में पहली बार भव्य आयोजन

इस वर्ष सोमेश्वर की लोद घाटी में भी स्याल्दे बिखौती मेले को विशेष रूप से भव्य रूप दिया जा रहा है। क्षेत्र के युवाओं ने पहली बार इस आयोजन की कमान संभाली है। लोद घाटी सांस्कृतिक मंच द्वारा 15 और 16 अप्रैल को दो दिवसीय विशेष कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की गई है। 15 अप्रैल को लोकगायक चंद्रशेखर टम्टा और भास्कर भौर्याल अपनी प्रस्तुतियाँ देंगे, जबकि 16 अप्रैल को प्रसिद्ध लोकगायक महेश कुमार और मेघना चंद्रा अपने सुरों से समां बांधेंगे। कार्यक्रम का संयोजन डॉ. वैभव भंडारी, कुन्दन सिंह भंडारी और क्षेत्रीय युवाओं की टीम द्वारा किया जा रहा है।

लोक कलाकारों और स्कूली बच्चों की सहभागिता

मेले को केवल एक धार्मिक आयोजन तक सीमित न रखकर इसे कला और संस्कृति का मंच बनाया गया है। विभिन्न विद्यालयों की टीमें और क्षेत्रीय सांस्कृतिक दल इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। दिन में पारंपरिक वेशभूषा में स्कूली बच्चों द्वारा सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी जा रही हैं, तो वहीं रात के समय पेशेवर कलाकारों द्वारा रंगारंग कार्यक्रम पेश किए जा रहे हैं।

क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था और जनता पर प्रभाव

स्याल्दे बिखौती मेला केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। समापन के दिन लगने वाला मीना बाजार क्षेत्रीय किसानों और शिल्पकारों को अपने उत्पाद बेचने का बड़ा मंच प्रदान करता है। स्थानीय हस्तशिल्प, पहाड़ी उत्पाद और पारंपरिक औजारों की यहाँ काफी मांग रहती है। इसके अलावा, यह मेला प्रवासी उत्तराखंडियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का एक माध्यम भी बनता है, जिससे पर्यटन और स्थानीय व्यापार को बढ़ावा मिलता है।

निष्कर्ष: विरासत को सहेजने का संकल्प

बदलते दौर में स्याल्दे बिखौती जैसे मेले हमारी लोक परंपराओं को जीवित रखने का कार्य कर रहे हैं। जिस तरह से युवा पीढ़ी इस आयोजन में सक्रिय भागीदारी निभा रही है, वह लोक कला और सामाजिक समरसता के लिए सुखद संकेत है। ओडा भेंटने जैसी रस्में और झोड़ा-चांचरी की तान नई पीढ़ी को अपनी गौरवशाली विरासत से परिचित कराने का सशक्त जरिया है।

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