बागेश्वर

शिवरात्रि पर बागनाथ धाम में गूंजी सतराली की पारंपरिक होली: 45 वर्षों के अंतराल के बाद पुनर्जीवित हुई विरासत

मुख्य संपादक · 16 फ़रवरी 2026 | 06:54 am

Holi
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बागेश्वर। उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल की विश्वप्रसिद्ध पारंपरिक होली का आगाज महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर बागनाथ धाम से हो गया है। ताकुला क्षेत्र के सतराली (सात गांवों) से आए होल्यारों ने भगवान बागनाथ के चरणों में होली गायन कर सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन किया। इस अवसर पर मंदिर परिसर ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष और होली के पारंपरिक भजनों से गुंजायमान हो उठा। 100 से अधिक होल्यारों ने ढोल-मजीरों की थाप पर गणेश स्तुति के साथ होली गायन शुरू किया, जो कुमाऊं की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और अटूट लोक आस्था का जीवंत प्रमाण है।


पूरा घटनाक्रम और पृष्ठभूमि

कुमाऊं में होली का उल्लास करीब एक महीने पहले ही शुरू हो जाता है, जहां गांवों और मंदिरों में बैठकी व खड़ी होली की परंपरा निभाई जाती है। बागेश्वर जिला मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक बागनाथ मंदिर में भगवान भोलेनाथ के जलाभिषेक के साथ ही होली गायन की विधिवत शुरुआत मानी जाती है। इसी क्रम में ताकुला क्षेत्र के सात गांवों—पनेरगांव, लोहाना, झाड़कोट, कोतवालगांव, कांडे, थापला और खाड़ी—के होल्यार ढोल-नगाड़ों के साथ मंदिर पहुंचे।

इन सात गांवों के समूह को ‘सतराली’ कहा जाता है। होल्यारों ने ‘सिद्धि के दाता विघ्न विनाशक खेलें होरी’ और ‘अजी हां जी शंभो तुम क्यों न खेले होरी लला’ जैसे पारंपरिक बोलों से पूरे वातावरण को भक्तिमय कर दिया। प्रकाश तिवारी, ललित कांडपाल और मनोज लोहानी जैसे अनुभवी होल्यारों के अनुसार, क्षेत्र में होली की औपचारिक शुरुआत बागनाथ धाम से ही होती है, जिसके बाद अन्य मंदिरों और एकादशी से गांवों में घर-घर जाकर होली गाने का सिलसिला शुरू होता है।

कारण और परिस्थितियाँ: पलायन का साया और वापसी

सतराली की यह ऐतिहासिक होली परंपरा एक लंबे समय तक संकट में रही थी। वर्ष 1972 से 2017 तक, लगभग 45 वर्षों तक यह परंपरा बाधित रही। इसके पीछे मुख्य कारण क्षेत्र से भारी पलायन और होली के पारंपरिक ज्ञान रखने वाले बुजुर्गों की कमी थी। पलायन की मार ने गांवों को खाली कर दिया था, जिससे सामूहिक सांस्कृतिक आयोजन थम गए थे।

हालांकि, वर्ष 2018 में क्षेत्र के जागरूक युवाओं ने अपनी जड़ों की ओर लौटने का संकल्प लिया और इस ऐतिहासिक परंपरा को पुनर्जीवित करने की पहल की। युवाओं के इस प्रयास से अब हर वर्ष शिवरात्रि पर सतराली के होल्यार बागनाथ धाम पहुंचकर अपनी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

जनता और पाठकों पर प्रभाव

इस आयोजन ने न केवल स्थानीय लोगों बल्कि पर्यटकों के बीच भी कुमाऊं की लोक संस्कृति के प्रति नया उत्साह जगाया है। शिवभक्ति और लोक संस्कृति के इस अनूठे संगम ने यह सिद्ध कर दिया है कि कुमाऊं की होली महज एक त्यौहार नहीं, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाली एक मजबूत सांस्कृतिक कड़ी है। मंदिर समिति के अध्यक्ष नंदन रावल और व्यापार मंडल अध्यक्ष हरीश सोनी सहित स्थानीय नागरिकों ने इस आयोजन में सक्रिय भागीदारी की, जो सामुदायिक एकता को दर्शाता है।

आगे क्या बदलेगा?

इस परंपरा के पुनर्जीवित होने से आने वाली पीढ़ी को अपनी लोक विधाओं, संगीत और पारंपरिक वाद्य यंत्रों (ढोल-मजीरे) के महत्व को समझने का मौका मिल रहा है। इससे स्थानीय पर्यटन और सांस्कृतिक संरक्षण को बल मिलेगा। युवाओं की बढ़ती भागीदारी यह सुनिश्चित करती है कि आने वाले समय में पलायन जैसी चुनौतियां सांस्कृतिक पहचान को खत्म नहीं कर पाएंगी।

आम आदमी को क्या फायदा या असर

एक आम नागरिक के लिए यह आयोजन अपनी जड़ों से जुड़ने का एक माध्यम है। यह न केवल मनोरंजन प्रदान करता है, बल्कि मानसिक शांति और आध्यात्मिक संतोष का भी स्रोत है। ऐसे आयोजनों से सामाजिक समरसता बढ़ती है, क्योंकि इसमें विभिन्न गांवों और वर्गों के लोग एक साथ मिलकर भाग लेते हैं। यह गौरव की अनुभूति कराता है कि हमारी सदियों पुरानी परंपराएं आज भी जीवंत हैं।

निष्कर्ष (जनहित के नजरिए से)

बागनाथ धाम में गूंजती सतराली की होली यह संदेश देती है कि कोई भी परंपरा तब तक जीवित रहती है जब तक समाज उसे सहेजने का प्रयास करता है। 45 साल के अंतराल के बाद इस परंपरा की वापसी एक सकारात्मक बदलाव है, जो पलायन की चुनौतियों के बीच अपनी संस्कृति को बचाने का रास्ता दिखाती है। यह कुमाऊं की अटूट सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण है जो पीढ़ियों को गौरवान्वित करता रहेगा।

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