देश-दुनिया

सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: देश में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने का क्या यही सही समय है?

मुख्य संपादक · 11 मार्च 2026 | 08:54 am

सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: देश में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने का क्या यही सही समय है?
विज्ञापन (Top) · Ad Space

नई दिल्ली। भारत के उच्चतम न्यायालय ने एक बेहद महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई के दौरान देश में ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) की आवश्यकता पर गंभीर टिप्पणी की है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने माना कि मुस्लिम महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को समाप्त करने का एकमात्र और स्थायी समाधान देश में ‘समान नागरिक संहिता’ को प्रभावी ढंग से लागू करना है। कोर्ट ने शरिया कानून के उन प्रावधानों पर सवाल उठाए हैं जो महिलाओं के उत्तराधिकार और समानता के अधिकारों को प्रभावित करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि व्यक्तिगत कानूनों की संवैधानिक जांच और उनमें सुधार के बजाय, विधायी शक्ति के माध्यम से एक साझा कानून लाना ही समय की मांग है।

घटनाक्रम और कानूनी पृष्ठभूमि

यह मामला 1937 के ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) एप्लिकेशन एक्ट’ की कुछ धाराओं को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि मौजूदा शरिया प्रावधानों के कारण मुस्लिम महिलाओं को संपत्ति और उत्तराधिकार के मामलों में पुरुषों के समान अधिकार नहीं मिलते, जो सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है।

सुनवाई के दौरान वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि यदि अदालत 1937 के अधिनियम के भेदभावपूर्ण हिस्सों को रद्द कर देती है, तो स्वतः ही भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधान लागू हो जाएंगे, जो सभी के लिए समान हैं। हालांकि, पीठ ने इस पर सावधानी बरतते हुए कहा कि सुधारों के प्रति “अति-उत्साह” में कहीं ऐसा न हो कि महिलाओं के पास जो वर्तमान अधिकार हैं, वे भी कानूनी शून्य (Legal Vacuum) पैदा होने के कारण छिन जाएं।

‘नारसु अप्पा माली’ फैसले का पुनरीक्षण

सुप्रीम कोर्ट इस सुनवाई के दौरान 1951 के प्रसिद्ध ‘नारसु अप्पा माली’ फैसले की प्रासंगिकता की भी समीक्षा कर रहा है। बॉम्बे हाई कोर्ट के उस पुराने फैसले में कहा गया था कि ‘पर्सनल लॉ’ संविधान के अनुच्छेद 13 के तहत आने वाली ‘कानून’ की परिभाषा में शामिल नहीं हैं, इसलिए उन्हें मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती। वर्तमान पीठ अब इस कानूनी पेच को देख रही है कि क्या व्यक्तिगत कानूनों को संवैधानिक कसौटी पर परखा जा सकता है या नहीं।

जनता और समाज पर इसका प्रभाव

यदि देश में समान नागरिक संहिता लागू होती है, तो इसका सबसे बड़ा प्रभाव विवाह, तलाक, गोद लेने और संपत्ति के उत्तराधिकार जैसे सामाजिक विषयों पर पड़ेगा। वर्तमान में भारत में अलग-अलग धर्मों के लोग अपने व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) के अनुसार इन मामलों को संचालित करते हैं।

  • समानता का अधिकार: इससे सभी धर्मों की महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बराबर का हिस्सा मिलने का रास्ता साफ होगा।

  • कानूनी एकरूपता: अदालतों में चल रहे पारिवारिक विवादों का निपटारा तेजी से हो सकेगा क्योंकि कानून सबके लिए एक जैसा होगा।

  • सामाजिक कुरीतियों का अंत: बहुविवाह जैसी प्रथाएं, जो किसी विशेष समुदाय तक सीमित हैं, वे स्वतः ही समाप्त हो जाएंगी।

क्या बदलेगा और आम आदमी को क्या होगा फायदा?

समान नागरिक संहिता का अर्थ किसी की धार्मिक मान्यताओं को छीनना नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों को एक समान बनाना है। एक आम नागरिक के लिए इसका सीधा फायदा यह होगा कि कानूनी पेचीदगियां कम होंगी। वर्तमान में, उत्तराधिकार के मामलों में अक्सर यह भ्रम रहता है कि कौन सा कानून किस पर लागू होगा। UCC आने के बाद एक ही ‘सिविल कोड’ के तहत सभी नागरिक अपनी समस्याओं का समाधान पा सकेंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे राष्ट्रीय एकता को बल मिलेगा और “एक देश, एक कानून” की अवधारणा मजबूत होगी। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि अदालतों के लिए यह बेहतर होगा कि वे इस संवेदनशील मामले को विधायिका (संसद) के विवेक पर छोड़ दें, क्योंकि नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत समान नागरिक संहिता लागू करना सरकार की जिम्मेदारी है।

निष्कर्ष: जनहित का दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियां स्पष्ट करती हैं कि न्यायपालिका अब व्यक्तिगत कानूनों के भीतर छिपे भेदभाव को खत्म करने के पक्ष में है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि न्यायपालिका की अपनी सीमाएं हैं और एक व्यापक कानून बनाना संसद का काम है। अंततः, इस चर्चा का केंद्र बिंदु ‘महिला सशक्तिकरण’ और ‘समानता’ है। यदि देश में एक समान कानून आता है, तो वह किसी धर्म के विरुद्ध न होकर, समाज के अंतिम पायदान पर खड़ी महिला के अधिकारों की रक्षा करने वाला सिद्ध होगा।

विज्ञापन (Middle) · Ad Space
शेयर करें:WhatsAppFacebook
विज्ञापन (Bottom) · Ad Space

संबंधित ख़बरें