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अब G Ram G… नरेगा से मनरेगा तक, क्या सच में बदली ग्रामीणों की तक़दीर?

मुख्य संपादक · 17 दिसंबर 2025 | 12:37 pm

अब G Ram G… नरेगा से मनरेगा तक, क्या सच में बदली ग्रामीणों की तक़दीर?
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सार-भारत की सबसे बड़ी ग्रामीण रोज़गार योजना नरेगा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। नाम बदलकर मनरेगा होने से लेकर इसके बजट, मजदूरी और काम के दिनों तक—हर बात पर बहस चल रही है। आइए, सरल भाषा में पूरा मामला समझते हैं।

विस्तार-📜 नरेगा क्या है और कब लागू हुई?

इस योजना का पूरा नाम था राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (NREGA)।
इसे 2005 में संसद ने पारित किया और 2 फरवरी 2006 से देश में चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया।

इस कानून के तहत ग्रामीण परिवारों को साल में कम से कम 100 दिन का रोज़गार देने की कानूनी गारंटी दी गई।

यह योजना यूपीए सरकार के समय, तत्कालीन प्रधानमंत्री Manmohan Singh के कार्यकाल में शुरू हुई।

🔁 नरेगा से “मनरेगा” क्यों बना?

2009 में सरकार ने योजना के नाम में महात्मा गांधी को जोड़ दिया।
तब से इसका आधिकारिक नाम हो गया—

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (MGNREGA / मनरेगा)

नाम बदलने का उद्देश्य था:

महात्मा गांधी के श्रम, स्वावलंबन और ग्राम-स्वराज के विचारों से जोड़ना

योजना को नैतिक और वैचारिक पहचान देना

⚒️ मनरेगा के तहत क्या काम होते हैं?

ग्रामीण इलाकों में आम तौर पर ये काम कराए जाते हैं:

तालाब, नहर, जल-संरक्षण कार्य

कच्ची सड़कें, खेतों की मेड़बंदी

वृक्षारोपण और भूमि सुधार

सूखा/बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्य

मजदूरी सीधे मज़दूरों के बैंक खाते में जाती है।

🔥 फिर बवाल क्यों मचा हुआ है?

हाल के वर्षों में मनरेगा को लेकर कई मुद्दों पर विवाद खड़ा हुआ है:

1️⃣ बजट कटौती का आरोप

आलोचकों का कहना है कि:

मांग बढ़ने के बावजूद बजट पर्याप्त नहीं

कई राज्यों में भुगतान में देरी

2️⃣ मजदूरी दर कम

महंगाई के मुकाबले मनरेगा की मजदूरी कम बताई जाती है

कुछ राज्यों में न्यूनतम मज़दूरी से भी नीचे

3️⃣ काम के दिन घटने की शिकायत

100 दिन की गारंटी होते हुए भी

कई परिवारों को 40–50 दिन ही काम मिल पाता है

4️⃣ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप

विपक्ष: सरकार योजना को कमजोर कर रही है

सरकार: योजना जारी है, लेकिन दुरुपयोग रोका जा रहा है

🧠 “G Ram G” वाला तंज क्या है?

“G Ram G” दरअसल सोशल मीडिया और राजनीतिक बहसों में इस्तेमाल हो रहा एक व्यंग्यात्मक अंदाज़ है—
जिसमें यह कहा जाता है कि:

नाम बदल गया

दावे बदल गए

लेकिन ज़मीन पर हालात वही या बदतर हैं

इसी तंज के जरिए लोग सवाल उठा रहे हैं—
“मनरेगा है, पर मन के मुताबिक रोज़गार कहां?”

🧾 निष्कर्ष

मनरेगा सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की जीवनरेखा रही है।
बेरोज़गारी, पलायन और आपदा के समय इसने करोड़ों लोगों को सहारा दिया है।

लेकिन आज सवाल यह है—

क्या मनरेगा अपने मूल उद्देश्य पर कायम है, या सिर्फ सियासी बहस का मुद्दा बनकर रह गई है?

यही वजह है कि नरेगा से मनरेगा तक का सफर एक बार फिर सुर्खियों में है—
और “जी राम जी” वाला तंज सोशल मीडिया से संसद तक गूंज रहा है।

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