बागेश्वर-स्वतंत्रता पूर्व काल से चली आ रही उत्तरायणी मेले की एक विशिष्ट और ऐतिहासिक पहचान यह रही है कि यह मेला केवल धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समय-समय पर जनसंवाद, वैचारिक अभिव्यक्ति और सामाजिक चेतना का भी प्रभावी मंच बनता रहा है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ऐतिहासिक उत्तरायणी मेले के दूसरे दिन सरयू बगड़ में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा पंडालों के माध्यम से विचार अभिव्यक्ति और जनसंवाद कार्यक्रम आयोजित किए गए।



इस अवसर पर भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) और संघर्ष वाहिनी सहित कई राजनीतिक व सामाजिक संगठनों ने अपने-अपने पंडाल स्थापित कर जनता से सीधा संवाद स्थापित किया। मेले के इस साझा और खुले परिवेश में अलग-अलग विचारधाराओं का शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व देखने को मिला, जिसने उत्तरायणी मेले की लोकतांत्रिक और समावेशी प्रकृति को और सुदृढ़ किया।
पंडालों में आयोजित कार्यक्रमों के दौरान सामाजिक, राजनीतिक और जनहित से जुड़े विषयों पर वक्ताओं ने अपने विचार विस्तार से रखे। क्षेत्रीय विकास, स्थानीय जनसमस्याएं, युवाओं के रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और राज्यहित से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की गई। मेले में पहुंचे नागरिकों ने विभिन्न पंडालों में जाकर वक्ताओं को सुना और इस बहुविचारात्मक संवाद में सक्रिय सहभागिता की। इससे आम लोगों को अलग-अलग दृष्टिकोण समझने और अपनी बात रखने का अवसर भी मिला।
विचार कार्यक्रमों के दौरान कांग्रेस के पंडाल से पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, गणेश गोदियाल, करण माहरा सहित अन्य नेताओं ने जनता को संबोधित किया। वक्ताओं ने राज्य की वर्तमान स्थिति, जनहित से जुड़े मुद्दों और लोकतांत्रिक मूल्यों पर अपने विचार साझा किए।
वहीं भारतीय जनता पार्टी के पंडाल से सांसद अजय टम्टा, कपकोट विधायक सुरेश गड़िया, दर्जा प्राप्त मंत्री शिव सिंह विष्ट, भूपेश उपाध्याय सहित अन्य वक्ताओं ने अपने विचार रखते हुए सरकार की नीतियों, विकास कार्यों और भविष्य की योजनाओं पर प्रकाश डाला। वक्ताओं ने स्थानीय समस्याओं के समाधान और जनसहभागिता की भूमिका पर भी जोर दिया।
नगर पालिका अध्यक्ष सुरेश खेतवाल ने जानकारी दी कि वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के तहत उत्तरायणी मेले में विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक विचारों को रखने की प्रक्रिया निरंतर बनी रही है। उन्होंने कहा कि यही विशेषता इस मेले को केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक विमर्श का जीवंत केंद्र बनाती है। यह परंपरा उत्तरायणी मेले के ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व को और अधिक व्यापक स्वरूप प्रदान करती है।
इस दौरान विभिन्न दलों द्वारा इच्छुक नागरिकों को अपनी संगठनात्मक गतिविधियों से भी जोड़ा गया। युवाओं, महिलाओं और स्थानीय नागरिकों ने इन कार्यक्रमों में रुचि दिखाते हुए संवाद स्थापित किया। राजनीतिक गतिविधियों के साथ-साथ मेला क्षेत्र में सांस्कृतिक और पारंपरिक आयोजनों की निरंतरता भी बनी रही, जिससे मेले का स्वरूप संतुलित और जीवंत बना रहा।
आम जनता के लिए इसका क्या महत्व है?
इस प्रकार के जनसंवाद कार्यक्रमों से आम नागरिकों को अपनी समस्याएं सीधे जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक नेतृत्व तक पहुंचाने का अवसर मिलता है। साथ ही विभिन्न विचारधाराओं को सुनकर लोग अधिक जागरूक बनते हैं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उनकी भागीदारी मजबूत होती है। उत्तरायणी मेले में विचार अभिव्यक्ति की यह परंपरा न केवल अतीत की विरासत है, बल्कि भविष्य में भी जनहित और सामाजिक संवाद को आगे बढ़ाने का सशक्त माध्यम बनी रहेगी।