बागेश्वर

देखने वाले ज्यादा, खरीद कम… मुश्किल में खरही का तांबा शिल्प

मुख्य संपादक · 18 जनवरी 2026 | 07:37 am

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बागेश्वर-खरही क्षेत्र का तांबा शिल्प उत्तराखंड की पारंपरिक पहचान का एक अहम हिस्सा रहा है। यहां के कारीगर पीढ़ियों से तांबे के बर्तन बनाते आ रहे हैं। शुद्ध तांबा, मजबूत बनावट और हाथ से की गई कारीगरी—यही इस शिल्प की खास पहचान है। समय बदला, बाजार बदला, लेकिन कारीगरों का हुनर आज भी उतना ही दमदार है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब बाजार कमजोर पड़ता दिख रहा है

इस बार बाजारों और मेलों में खरही के तांबा शिल्प की भरमार है। तांबे के लोटे, गागर, कलश, थाल, परात, हांडी, पूजा सामग्री और छोटे सजावटी आइटम सजे हुए हैं। लोग रुकते हैं, ध्यान से देखते हैं, शुद्धता के बारे में पूछते हैं और कारीगरों की मेहनत की तारीफ भी करते हैं। लेकिन इसके बाद अक्सर एक ही बात सुनने को मिलती है—
“सामान बहुत अच्छा है, लेकिन अभी महंगा लग रहा है।”

महंगाई ने बदली खरीद की आदत

कारीगर बताते हैं कि तांबे की कीमत पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ गई है। कच्चा तांबा, ईंधन, औजारों की मरम्मत और मजदूरी—सब पर खर्च बढ़ा है। ऐसे में बर्तनों के दाम बढ़ाना मजबूरी बन गई है। दूसरी ओर आम आदमी की आमदनी उसी रफ्तार से नहीं बढ़ी। रोजमर्रा की जरूरतें—खाना, बच्चों की पढ़ाई, इलाज—पहले पूरी करनी होती हैं। ऐसे में तांबे के बर्तन खरीदना लोग टाल देते हैं।

पहले जहां घर-घर में तांबे का लोटा और गागर आम बात थी, वहीं अब लोग स्टील या प्लास्टिक के सस्ते विकल्प चुन रहे हैं। इससे पारंपरिक तांबा शिल्प की बिक्री पर सीधा असर पड़ रहा है।

देखने वाले ज्यादा, खरीदने वाले कम

बाजार में साफ दिखता है कि

  • ग्राहक ज्यादा हैं

  • खरीदार कम हैं

लोग शिल्प को देखकर संतुष्ट हो जाते हैं। कुछ लोग मोबाइल से फोटो खींच लेते हैं, कुछ कीमतें तुलना करते हैं और फिर बिना खरीदे लौट जाते हैं। यह विंडो शॉपिंग का चलन कारीगरों के लिए चिंता का कारण बन गया है।

छोटे आइटम ही बन रहे सहारा

कारीगरों का कहना है कि बड़े बर्तन कम बिक रहे हैं। हां, छोटे तांबे के दीये, पूजा के लोटे, छोटे कलश या सजावटी आइटम थोड़े बहुत बिक जाते हैं। इनसे रोज का खर्च निकल जाए, यही बड़ी बात हो गई है। कई कारीगर बताते हैं कि मेले में स्टॉल लगाने, रहने और खाने का खर्च निकालना भी मुश्किल हो रहा है।

परंपरा पर मंडराता खतरा

खरही का तांबा शिल्प केवल रोजगार नहीं, बल्कि एक परंपरा है। यह काम परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला है। लेकिन कमजोर बाजार के कारण युवा पीढ़ी इस काम से दूर होने लगी है। वे कहते हैं कि मेहनत ज्यादा है, आमदनी कम। अगर यही हाल रहा, तो आने वाले समय में यह पारंपरिक शिल्प सिमट सकता है।

क्या बदलेगा आम लोगों के लिए?

अगर खरही का तांबा शिल्प कमजोर पड़ा, तो इसका असर सिर्फ कारीगरों पर नहीं पड़ेगा। आम लोगों के लिए भी कई बदलाव होंगे—

  • शुद्ध तांबे के बर्तन बाजार से गायब हो सकते हैं

  • स्थानीय पहचान और संस्कृति कमजोर होगी

  • सस्ते लेकिन कम टिकाऊ विकल्पों पर निर्भरता बढ़ेगी

आज अगर लोग थोड़ा सहयोग करें और स्थानीय शिल्प को प्राथमिकता दें, तो यह परंपरा बच सकती है।

समाधान की जरूरत

कारीगरों और स्थानीय लोगों का मानना है कि

  • तांबा शिल्प को सरकारी और सामाजिक सहयोग मिले

  • मेलों में बेहतर प्रचार हो

  • ऑनलाइन बिक्री के अवसर दिए जाएं

  • लोगों को तांबे के स्वास्थ्य लाभों के बारे में जागरूक किया जाए

निष्कर्ष

खरही का तांबा शिल्प आज भी अपनी गुणवत्ता और खूबसूरती में मजबूत है। कमी है तो सिर्फ बाजार की। महंगाई ने खरीदार की जेब पर असर डाला है, लेकिन अगर आज यह शिल्प नहीं बचा, तो कल पछताने के अलावा कुछ नहीं बचेगा। थोड़ी सी खरीद, एक बड़ी परंपरा को जिंदा रख सकती है।

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