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पद्म विभूषण तीजन बाई का निधन: पंडवानी की अमर आवाज़ हुई खामोश, भारतीय लोककला जगत ने खोया अनमोल रत्न

मुख्य संपादक · 6 जुलाई 2026 | 12:10 pm

पद्म विभूषण तीजन बाई का निधन: पंडवानी की अमर आवाज़ हुई खामोश, भारतीय लोककला जगत ने खोया अनमोल रत्न
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नई दिल्ली/रायपुर। भारतीय लोककला की दुनिया को रविवार को गहरा झटका लगा, जब प्रसिद्ध पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का लंबी बीमारी के बाद रायपुर स्थित एम्स में निधन हो गया। वह 70 वर्ष की थीं। उनके निधन के साथ भारतीय लोक परंपरा की एक ऐसी सशक्त आवाज़ हमेशा के लिए शांत हो गई, जिसने छत्तीसगढ़ की पंडवानी कला को देश ही नहीं, दुनिया के कई देशों तक नई पहचान दिलाई।

तीजन बाई पिछले कई सप्ताह से अस्वस्थ थीं और रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में उनका उपचार चल रहा था। अस्पताल के चिकित्सकों के अनुसार उन्होंने रविवार तड़के अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर सामने आते ही कला, साहित्य और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई।

प्रधानमंत्री ने भी उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि तीजन बाई ने अपनी अद्भुत प्रतिभा और समर्पण से भारतीय लोककला को वैश्विक पहचान दिलाई। कई राज्यों के मुख्यमंत्री, कलाकारों और सांस्कृतिक संस्थाओं ने भी उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके योगदान को भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर बताया।

गांव से विश्व मंच तक का प्रेरक सफर

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मीं तीजन बाई ने बेहद कम उम्र में पंडवानी गायन शुरू किया। उन्होंने महाभारत की कथाओं को अपनी प्रभावशाली आवाज़, अभिनय और मंच प्रस्तुति के माध्यम से एक नई पहचान दी। उस दौर में जब यह कला मुख्य रूप से पुरुष कलाकारों तक सीमित मानी जाती थी, तब तीजन बाई ने सामाजिक परंपराओं को चुनौती देते हुए अपनी अलग पहचान बनाई।

देश-विदेश में मिली पहचान

दशकों लंबे अपने कलात्मक सफर में उन्होंने भारत के साथ-साथ यूरोप, एशिया और अन्य देशों में भी पंडवानी का प्रदर्शन किया। उनकी प्रस्तुतियों ने छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। भारतीय लोककला में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण और बाद में पद्म विभूषण जैसे देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया गया।

आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा

तीजन बाई केवल एक लोकगायिका नहीं थीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत की जीवंत पहचान थीं। उन्होंने अनेक युवा कलाकारों को पंडवानी सीखने और लोककलाओं से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। उनकी कला ने यह साबित किया कि प्रतिभा और समर्पण के बल पर किसी भी क्षेत्रीय कला को वैश्विक मंच तक पहुंचाया जा सकता है।

भारतीय संस्कृति के लिए अपूरणीय क्षति

लोककला विशेषज्ञों का मानना है कि तीजन बाई का जाना केवल एक कलाकार का निधन नहीं, बल्कि भारतीय लोक परंपरा की एक अमूल्य धरोहर का खो जाना है। हालांकि उनकी आवाज़ अब सुनाई नहीं देगी, लेकिन पंडवानी के माध्यम से सुनाई गई महाभारत की उनकी जीवंत प्रस्तुतियां आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेंगी।

भारतीय लोककला के इतिहास में तीजन बाई का नाम सदैव सम्मान के साथ लिया जाएगा। उन्होंने अपनी कला से यह साबित किया कि लोक परंपराएं केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की सांस्कृतिक पहचान भी हैं। उनकी स्मृतियां और योगदान भारतीय संस्कृति में हमेशा जीवित रहेंगे।

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